Sunday, 29 August 2010

बूंदों का विश्वासघात

मैं आस्तिक नहीं हूं न ही नास्तिक हूं। भगवान का अस्तित्व मेरे लिए सिर्फ मेरे डर को एक नया रूप देने का माध्यम है। मगर मैं भगवान को नहीं मानता, मगर उसके अस्तित्व को पूर्णतयाः नकार भी नहीं सकता हूं। भगवान है, क्यों है ? इसका जवाब भी मैं आपको दूंगा। मेरे लिए भगवान का अस्तित्व सिर्फ इसलिए है कि क्योंकि मुझे भी डर लगता है। कालेज के गेट के अंदर सभी का मानना है कि मुझमें भी कुछ बात है, मैं कुछ करूंगा। मगर मेरा मानना है कि नहीं, मैं कुछ नहीं, शायद कुछ भी नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मुझे डर लगता है। मगर दोस्तो अभी मैं आपको अपने डर से नहीं बल्कि इस डर से बचने के साधन के बारे में बताना चाहूंगा। ‘‘मां की गोद’’ यकीन कीजिए अगर आपके पास यह साधन है तो दुनिया में कोई भी डर आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस दुनिया के बहुत सारे रंगों को मैंने बड़े नजदीक से देखा है, इसलिए मेरी बात पर यकीन कीजिए। अक्खी मुंबई पर राज करने वाले ‘‘वास्तव’’ के रघु भाई को जब ज़िंदगी में पहली बार डर लगा तो वो अपनी मां के गोद में जाकर छिप गये थे। रघु भाई ही क्यों, मुन्ना भाई M.B.B.S. भी तो अपनी मां की जादू की झप्पी के मिलते ही उनका डर चला जाता है।चौड़ी सड़के, लम्बी-लम्बी और बड़ी-बड़ी गाडियां, ऊंचे-ऊचे बंगले और उन बंगलों के गेट के अंदर से झांकने वाले कुत्ते जब मुझे डरा देते है तो मुझे भी अपनी मां की याद आ जाती है।   मेरे अपनों के सपनों का बोझ उठाये हुए मेरे ये पतले कंधे जब 4-6 महीनों में थक जाते हैं जो मुझे मेरी मां की याद आ जाती है मैंने कभी इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया है कि मुझे भी डर लगता है। इसलिए इन पन्नों पर अपनी स्वीकार करके मैं अपने मन को हल्का करने की कोशिश कर रहा हूँ।